आकाश गमन और आसन, उत्थान क्रिया योग को जानिये, जानिए इसके रहस्य को, बता रहे हैं श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज

 

 

 

श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येन्द्र जी महाराज आज एक ऐसे महत्त्वपूर्ण विषय पर चर्चा कर रहे हैं और यह चर्चा एक ऐसे ज्ञान पर है जो शायद ही आपने कहीं पढ़ा या देखा सुना होगा। आज स्वामी जी आपके समक्ष एक ऐसा ज्ञान प्रस्तुत करने जा रहे हैं जिसे पढ़ने के बाद आप अपने जीवन में बहुत सारे लाभ उठा सकते हैं।

स्वामी जी द्वारा बताए इस ज्ञान को आप भी पढ़े और अपने जीवन में उतार लें आप यकीन मानिए आपके जीवन की बहुत सारी कठिनाइयां दूर हो जाएंगी।

आकाश गमन ओर आसन उत्थान क्रिया योग के ज्ञान रहस्य को बता रहे है-स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी-आओ उनसे जाने:-

आसन से उपर उठ जाना और आकाश मे इच्छानुसार आवागमन यानि उड़ना,आना जाना करना दोनो बिलकुल अलग क्रिया है। ओर आसन उत्थान यानि केवल जहाँ योगी बैठा है,उसी स्थान के ऊपर तक अधिक ऊंचाई तक वायु में उठकर स्थिर होना अथवा जहाँ जाने की इच्छा है,उस स्थान पर वायु में उड़कर चले जाने की इस सिद्धि या क्षमता का, अध्यात्मिक्ता से क्या रिश्ता है?

भौतिक विज्ञानं कहता है कि-मनुष्य की ये स्थूल देह या दिखाई देने वाला भौतिक शरीर जब तक मध्याक्रष्ण के आधिन है,तबतक उस पर गुरुत्वाकर्ष्ण का बल लगने से आकाश गमन आदि क्रियाये सम्भव नही है। तो ये कैसे सम्भव हो सकता है?
तो साधको ये योग विज्ञानं में ऐसे होता है की- मध्याकर्ष्ण बल का नियम देह कि स्थूल निवर्ति यानि कि तमोगुण ओर सत्वगुण के शोधन कि क्रिया से होता है। ओर रजोगुण अर्थात केवल क्रिया योग मे स्थिति से होता है।क्योकि रजगुण का नाम क्रिया गुण है। और तमोगुण का धर्म है- आकर्ष्ण बल यानि खींचना व सतो गुण का धर्म है-इसके विपरित विकर्ष्ण बल यानि फेंकना, उत्थान व प्रकाश देना है।और क्रिया शील रजोगुण का कार्य है, इन दोनो को एक दुसरे जोडना। अत: जब साधक कि तपस्या,योग क्रिया,प्राथर्ना,ध्यान आदि द्धारा, सतगुण ओर रजोगुण मिल कर एक हो जाते है, और साधक के शरीर में सतगुण का अधिक विकास होने लगता है तब तमोगुण दब जाता है। और ये भैतिक देह प्रकाशयुक्त हो कर हलकी हो जाती है।यहाँ कहने का अर्थ है कि- बाहर से देह चाहे देखने मे भारी हो, पर वो अन्दर से सूक्ष्म स्तर पर हलकी हो जाती है।और देह इस दिखाई देने वाले वायु के अनंत समुन्द्र मे ऊपर कि ओर उतिथ या उठने लगती है।यही है आसन उत्थान की क्रिया विज्ञानं रहस्य-जो कुण्डलिनी शक्ति के प्रबल रुप से जाग्रत होने से, ये सब सम्भव होता है।जो साधक भस्त्रा प्राणायाम व तीनो बन्धों का उच्चतम अभ्यास कम से कम तीन या सात वर्ष करते है,और अपने मनोबल कि चोट के निरन्तर आघात से मुलाधार मे से सुप्त कुंडलिनी को जाग्रत करते है। तब उनके अन्दर कि प्राण वायु, बाहर कि वायु से हलकी हो कर देह को उपर उटाती है।यहाँ साधक कि कुंडलिनी मुलाधार मे से, साधक कि प्राण वायु को बार बार उठकर तप्त यानि गर्म करती है। जिसके बल से देह के अणु परमाणु शुद्ध हो कर, देह को हलका कर प्रकाश युक्त बना देते है। जिससे साधक के शरीर से निकलने वाली गर्म उर्जा से बाहर कि वायु का प्रभाव घट जाता है।और साधक का शरीर वायु मे उठ जाता है। लेकिन ऐसा होने से आकाश गमन नही सिद्ध होता है। उसके लिये हमें विश्व मे व हमारे अन्दर क्रिया कर रही दो विरोधी शक्तियो का सन्धि स्थल पता करना पडता है।जिसे- जब नाक से दोनो स्वर एक साथ चलते है और जैसे- दिन व रात्रि के मध्य चार सन्धि पहर है।ठीक वैसे ही हमारे अन्दर भी तम व सत गुण एक समान अवस्था मे साधना के बल से आ जाते है। तब साधक को मध्य मार्ग प्राप्त हो जाता है।ये मध्य मार्ग यानि शून्य का मार्ग या पथ। जिसे महात्मा बुद्ध ने मध्य मार्ग कहा है। इस मध्य मार्ग या मध्य पथ कि प्राप्ति होने पर ही आसन कि उर्ध्व गति आरम्भ होती है।यही सत्य मार्ग कहलाता है।जब साधक के शरीर मे ये प्राण गति जितनी अधिक उर्ध्व यानि ऊपर की और चढ़ती या होती जाती है। यानि कि-आज्ञाचक्र तक आ कर उसे भेद जाती है। तब साधक को आकाश मे जो सूर्य की किरणे या रश्मिया है। उनका ज्ञान जान कर, उन पर पकड बढ़ानी पडती है। तब उन मे से किसी एक किरण को अपना यात्रा पथ बना कर, आकाश मे जहाँ चाहे यात्रा करने कि सिद्धि प्राप्त हो जाती है।ये देह का विशुद्धिकरण किसी दिव्य मणि या ओषधि से भी कि जाती है।जो दिव्य रसायन के ज्ञान से होता है। परन्तु इसके बाद यही सब जानकर भी, यही साधना कि जाती है। आकाश गमन कि सिद्धि के तीन प्रकार है।
1-वहन गति जैसे की-पंक्षी मे संयम कर उसकि भांति उडा जाता है।
2-अधिमोक्ष गति-जिसमें योगी को वस्तु या स्थान पर नही जाना पडता है। बस योगी केवल इच्छा कर वस्तु व स्थान के मध्य का काल-बन्धन-सीमा या कहे उनके बीच का पर्दा समाप्त कर, उसको अपने पास बुला या वहां से जो चाहिये, वो ले लेता है।
3-मनोजवित्व गति-जैसे- हनुमान जी का उडना है।यहां एक क्रिया योग नही बताया गया है। जिसमें सिद्धासन के साथ त्रिबन्ध लगा कर, अपनी अन्दर जाती सामान्य स्वास के साथ मनोबल कि चोट को लगातार, लगा कर मुलाधार चक्र से कुंडलिनी को जाग्रत किया जाता है। ये रहस्य फ़िर कभी आगे लेख में आपको बताऊंगा और इस विषय पर मेरा व्यक्तिगत अनुभव विषयक घटना यहाँ आपको बताता हूँ-

सत्यास्मि क्रिया योग और सूक्ष्म शरीर आसन उत्थान अनुभव व् रोग निवारण का प्रसंग:-

ये लगभग सन् 1984 से पूर्व की बात है। तब हमारी एक परिचित सदूर के ननसाल के रिश्ते की बहिन माया के स्तन में केन्सर के रोग से पीड़ित हो गयी थी। तब उन दिनों मैं अपनी साधना में लीन रहने के साथ साथ अपने गांव के कृषि के कार्य में व्यस्त रहता था। तब उन दिनों हमारे पिता जी ककोड़ इंटर स्कुल के प्रबन्धक थे। उनके पुस्कालय के लिए अनेक पत्रिका आती थी। जिनमे कादम्बिनी पत्रिका भी थी। जिसमें मैने सूक्ष्म शरीर पर अनेक लेख और देश विदेश के व्यक्तियों के अनुभव और रोग निवारक क्षमताओं के विषय में लेख पढ़े। तब उस समय मुझे भी अंतरात्मिक प्रेरणा थी की- अपनी प्राप्त अध्यात्मकि शक्तियों का उपयोग किसी भी परिस्थितियों में नही करना। क्योकि तुम्हें परिस्थितियों के संषर्ष से बहुत मनुष्यतावादी समाजिक ज्ञान का, परिस्थितियों पर सहज भाव से कैसे विजय प्राप्त करे? इसका ज्ञान होगा। तभी आध्यात्मिक शक्तियों का भविष्य में सही उपयोग कर सकोगे। तब मेने अपनी उन परिचित बहिन माया के लिए पत्रिका में दिए आध्यात्मिक चिकित्सक लोगों के- डा.रमाकांत केनी बोम्बे हॉस्पिटल न्यू मेरीन लाइंस,बाबा अब्दुल खान जी मंजिल दो सो छ विलियम टाउन बेंगलोर,मिस्टर जॉन ब्रांच और मिस्टर ray branch the harry Edwards spiritual heeling sanctuary England,श्री ब्रह्म गोपाल भादुड़ी रामपुरा वाराणसी,शिव शक्ति सदन बख्शी नगर जम्मू,किशोरी लाल तांत्रिक राम सागर गया आदि और विदेश के प्रसिद्ध चिकित्सकों के उस और अन्य पत्रिकाओं में उपलब्ध अनेक
पतों पर उनका चित्र भेज पत्राचार किया। तो मेरे उन्हें भेजे लिफाफे में रखे मेरे भेजे पोस्टकार्ड पर आया की उपाय करते है। (और विदेशी चिकित्सकों का कोई पत्र नही आया था) परन्तु बहुत समय बीतने पर भी कुछ नही हुआ।मेने सोचा की- सम्भव है, इन लोगों के पास अल्प समय हो, कुछ ही कृपा की ही हो, तब भी कोई लाभ नही हुआ। तब उनकी स्थिति देख, मेने निश्चय किया की-मैं ही इनकी चिकित्सा को अपना योग बल लगता हूँ।तब एक रात्रि में मेने अपने तख्त पर पहले बैठकर उसके उपरांत लेटे हुए अपने मंत्र से, अपने अंतरशरीर में अनुलोम विलोम क्रिया योग को करते हुए उनका ध्यान किया।तभी मुझे अन्तर्वाणी हुयी, अरे ये नही बचेंगी। इनकी मृत्यु इसी रोग से लिखी है। व्यर्थ में शक्ति क्षय मत करो। पर मेरे मन में प्रतिरोध हुआ की- फिर क्या लाभ जब किसी के लिए कुछ नही कर सकते?, तो तब पुनः अन्तर्वाणी ने कहा की- इसने कोई ऐसा पूण्य नही किया, जो इसे इस रोग से मुक्ति दे सके। और ना ही तुमसे कोई विशेष अनुरोध प्रार्थना की है, की-मुझे स्वस्थ करो।तुम स्वयं की निजी करुणा भाव से इससे जुड़ रहे हो। और उनके सम्बन्ध अनेक बाते दिखाई दी। ये सब जान कर, फिर भी मैंने प्रयत्न नही त्यागा। तब मेने देखा की- मैं उनके पास खड़ा हूँ और उन्हें अपनी ऊर्जा दे रहा हूँ।और ऐसा देखते ही, अचानक सब लुप्त हो गया। और एक झटका सा लग कर मेरा ध्यान चैतन्य होने लगा।तब मेने अनुभव किया की-पहले मेरा सिर तख्त पर लगा, और साथ ही मेरे दोनों पैर भी धम्म से तख्त पर लगे, लगा की-मैं अपने तख्त से कुछ ऊपर तक उठा हुआ था। तभी ऐसा हुआ होगा। मेने तब पूर्ण चैतन्य होकर, पेशाब करने जाकर वापस आकर जप ध्यान किया। और पुनः अपनी योग निंद्रा में लीन हो गया।प्रातः अपनी योगाभ्यास और व्यायाम किये, और अपने दैनिक कार्यों में लग सब भूल गया। तब शाम को स्मरण आया की- जाकर बहिनजी से, उनका हालचाल पुंछ आऊं।तब उनके घर गया, वे बिस्तरे पर लेती थी, कुछ उठी सी होकर बेठी, तब मेने पूछा की- और क्या हाल है?,कुछ आराम है या नही?,तब वे बोली अरे-भैया रात्रि में बड़ा आश्चर्य देखा की- जाने की मेरी खुली आँख थी या बन्द थी?,वेसे कष्ट से नींद नही थी। तब देखा तुम मेरे सिरहाने खड़े हो और दुधियां प्रकाश से प्रकाशित हो। कुछ बोल रहे हो, पर समझ नही आया और अचानक सब गायब सा हो गया। मेने आँख मली, पर कुछ नही था, बस अँधेरा था।तब कुछ देर बाद मुझे पहली बार बहुत दिनों में अच्छी नींद आई, कुछ अच्छा लग रहा है।फिर मैं बहुत दिनों को कृषि के काम से गांव चला गया। तब लोटा तो उन्हें बाहर घूमते देख वे मुझे देख प्रसन्न हुयी बताया,की अब रोग बहुत कुछ घटा है। बहुत ठीक अनुभव है। परन्तु कुछ महीनों के उपरांत पुनः रोग बढ़ा और उनकी मृत्यु हुयी। इससे मुझे ये ज्ञान पता चला की-यदि रोगी कोई भी दान पूण्य जप तप सेवा नही करता है या कोई आध्यात्मिक गुरु से नही जुड़ा है। तब उसे दी गयी आध्यात्मिक साहयता भी कुछ समय, उसे स्वस्थ लाभ देकर, पुनः उसके पाप बल उसे रोगी बना,उसका कर्म फल कष्ट या मृत्यु के रूप में अवश्य देते है। यही प्रकर्ति का नियम है। यो सदा धर्म के तीन पक्ष से अवश्य जुडो…
सेवा और तप और दान,
तब अवश्य हो कल्याण।।
और जप ध्यान करने पर अनेक आलोकिक योग अनुभूति स्वयं होती है ज्यों ज्यों कोई एक मन्त्र जपने से वो पहले तन से मन में प्रवेश करता है। तब वो प्रथम प्राण शरीर को मंथ कर अलग करता है। यही प्राण शरीर ही अन्य मनुष्यों में अपनी प्राण शक्ति को उससे युक्त करने पर उसे स्वस्थ करता है। जिसका संक्षिप्त प्रचलित नाम “प्राण विद्या” प्राणायाम या रेकी आदि है। इससे ऊपर है-मन शरीर का निर्माण होना, तब अंतर्जगत खुल जाता है। मन ही मन्त्र बनता है। और मन्त्र ही मन बनता है। तब मनोमय शरीर में कुण्डलिनी यानि मंत्र के मन्थन से प्राप्त विधुत शक्ति से नवचक्रों का शोधन और बोधन होता है। तभी योगी को अनेक अलौकिक शक्तियां प्राप्त होती है। यो एक मंत्र, एक ध्यान विधि और चित्त एकाग्र को, गुरु मूरत का ध्यान करते रहो। वो प्रत्य्क्ष है- यो शिष्य और गुरु में, जीवित होने से आकर्षण विकृष्ण का सूक्ष्म योग मन्थन चलता है।जिससे शिष्य में योगानुभूतियां उत्पन्न होती है। उस समय शिष्य में गुरु की शक्तियों का ही दर्शन और लाभ प्राप्त होता है। बहुत बाद में स्वयं की शक्ति प्राप्त होती है।इस विषय पर आगे अन्य अपना लेख लिखता हूँ।

 

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श्री सत्यसाहिब स्वामी सत्येंद्र जी महाराज

जय सत्य ॐ सिद्धायै नमः

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